उस धरती से, जहां बुंदेलखंड की पहाड़ियाँ धूप सराब होकर इतिहास गुनगुनाती हैं, जहाँ वीरता के गीत हवा में घुलमिल गए हैं, वहीं से 3 अगस्त, 1886 को एक ऐसा कवि जन्मा, जिसकी कलम ने हिंदी साहित्य के पन्नों पर नवजीवन का रंग भरा। वह थे मैथिलीशरण गुप्त, जिन्हें बाद में उनकी अमर कृतियों और देशप्रेम के लिए सम्मान से 'राष्ट्रकवि' की उपाधि से विभूषित किया गया।
गुप्तजी का जीवन ही मानो काव्य का एक लंबा छंद था। झाँसी के निकट चिरगांव में एक धनाढ्य परिवार में जन्मे, उन्हें बचपन से ही शब्दों का जादू रास आया। पिता थे रामचरण जी, रामभक्त और काव्यप्रेमी, जिन्होंने अपने बेटे की प्रतिभा को पहचाना और उसे पंख दिए। गुप्तजी औपचारिक शिक्षा से विमुख रहे, पर घर पर ही संस्कृत, बांग्ला और हिंदी में निपुणता प्राप्त की। उनके भीतर का कवि बचपन से ही फूट पड़ा। 12 वर्ष की आयु में ही मुंशी अजमेरी जी के मार्गदर्शन में उन्होंने "कनकलता" नामक कविता रची, जो उनकी प्रतिभा की पहली किरण थी।जैसे-जैसे वे युवा हुए, वैसे-वैसे उनकी लेखनी में परिपक्वता और राष्ट्रभक्ति का स्वर तेज होता गया। वे "वैश्योपकारक" पत्रिका में अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाते थे, जहाँ उनकी राष्ट्रीय चिंता और सामाजिक सुधार की लहर दिखाई देती थी। लेकिन 1912 में उनकी कृति "भारत-भारती" के प्रकट होते ही साहित्य जगत में क्रांति आ गई। यह महाकाव्य भारत के प्राचीन गौरव को पुनर्जीवित करता था, भारत की संस्कृति और इतिहास को इतने शानदार शब्दों में बुनता था कि हर सच्चे भारतीय के दिल में देशप्रेम का ज्वार उफन पड़ता था। महात्मा गांधी ने उनकी इस कृति को "राष्ट्रभक्तों का वस्त्र" कहा, और उन्हें "राष्ट्रकवि" की सम्मानपूर्ण उपाधि दी।
"भारत-भारती" की सफलता के बाद गुप्तजी की कलम रुकी नहीं। उन्होंने "साकेत", "यशोधरा", "द्वापर", "सिद्धनियत" और "जयद्रथ वध" जैसे महाकाव्य रचे, जिन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उनकी रचनाओं की खासियत थी कि वह ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं को वर्तमान से जोड़कर प्रस्तुत करते थे। वह राम, सीता, लक्ष्मण और कृष्ण जैसे पात्रों में नए आयाम तलाशते थे, उनकी वीरता, त्याग और प्रेम को नए सिरे से उजागर करते थे। उनकी कविता में राष्ट्रभक्ति, आत्मनिर्भरता, नारीशक्ति और सामाजिक सुधार का जोश साफ झलकता था।
लेकिन गुप्तजी महान कवि होने के साथ-साथ बहुमुखी प्रतिभा के धनी भी थे। उन्होंने कई नाटक और गीत भी लिखे, जो उनके साहित्यिक कौशल का दूसरा पहलू दर्शाते हैं। "जनमंजरी", "विसर्जन" और "कविराज का कानून" उनके प्रमुख नाटकों में से हैं, जिनमें उन्होंने सामाजिक विषयों को बड़ी कुशलता से उठाया है। वहीं उनके गीत भावुकता और संगीतमयता से भरे हुए हैं, जिन्हें आज भी गुनगुनाया जाता है।
गुप्तजी का साहित्यिक योगदान सिर्फ रचनाओं तक ही सीमित नहीं है। वह स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय समर्थक रहे, सामाजिक सुधार और नारी शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने अपने लेखन और भाषणों के जरिए जनता को जागरूक किया और भारत के उज्ज्वल भविष्य का सपना दिखाया। उनकी लेखनी सामाजिक कुरीतियों और अन्याय के खिलाफ उठती खंजर थी, जो भेदभाव और अज्ञानता के अंधकार को छिन्न-भिन्न करती थी।
गुप्तजी का जीवन विपरीतों से भी अछूता नहीं रहा। उन्हें आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ा, राजनीतिक उथल-पुथल का दौर देखा, लेकिन उनकी कलम कभी रुकी नहीं। वह निरंतर समाज को दर्पण दिखाते रहे, प्रेरणा देते रहे, और राष्ट्रप्रेम का मशाल जलाते रहे। उनके सरल स्वभाव, विनम्रता और सहृदयता ने उन्हें साहित्य जगत में ही नहीं, समाज में भी सम्मान प्राप्त कराया। उन्हें प्यार से 'दद्दा' कहा जाता था, जो उनकी उदारता और पितृसत्तात्मक स्नेह का प्रतीक था।
12 दिसंबर, 1964 को उनके देहावसान ने हिंदी साहित्य जगत को शोकग्रस्त कर दिया। लेकिन उनकी रचनाएँ समय की धारा में बहती हुई, आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं। युवा कवियों के लिए मार्गदर्शक, देशप्रेमियों के लिए प्रेरणा और भारत की सांस्कृतिक विरासत का अक्षुण्ण भंडार, मैथिलीशरण गुप्त का नाम हिंदी साहित्य के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा है। उनकी कविता आज भी उतनी ही सार्थक और प्रासंगिक है, जैसे सृजन के समय थी। उनका शब्द-संसार सदियों तक समाज को दिशा देता रहेगा, राष्ट्रप्रेम की ज्वाला जलाता रहेगा, और हिंदी साहित्य के गौरव को चमकाता रहेगा।
